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चिंतन:अहितकर बातें व विषमता आनंदमय जीवन के लिए जहर है,कभी इन्हें आत्मसात न करे:ठाकुर संजीव कृष्ण

राधे राधे ॥ आज का भगवद चिन्तन ॥
20–07-2020
श्रावण मास शिवतत्व
भगवान् शिव का एक नाम नीलकंठ भी है। समुद्र मंथन के समय निकले विष को लोक कल्याणार्थ भगवान शंकर पान कर गए। विष को ना उन्होंने अपने भीतर जाने दिया और ना ही मुख में रखा, कंठ में रख लिया।
जीवन है तो पग-पग पर बुराइयों का सामना भी करना पड़ता है। जीवन को आनन्दपूर्ण बनाने के लिए आवश्यक है कि जो बातें हमारे लिए अहितकर हों हम उन्हें ना अपने मुख में रखें और ना अपने भीतर जाने दें। शिवजी की तरह पचा जाएँ।
विषमता रुपी विष अगर आपके भीतर प्रवेश कर गया तो यह आपके जीवन की सारी खुशियों को जलाकर भस्म कर देगा। इसलिए इसे कंठ तक ही रहने देना, चित्त (मन) तक मत ले जाना।

कल का दिन किसने देखा है,
आज अभी की बात करो।
ओछी सोचों को त्यागो मन से,
सत्य को आत्मसात करो।

हिम्मत कभी न हारो मन की,
स्वयं पर अटूट विश्वास रखो।
मंजिल खुद पहुंचेगी तुम तक,
मन में सोच कुछ खास रखो।

संजीव कृष्ण ठाकुर जी
श्री धाम वृन्दावन