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बात पते की:मेरा देश ऐसा तो ना था…

पते की बात : मेरा देश ऐसा तो ना था…

अभी अभी एक समाचार चैनल पर स्तब्ध करने वाला समाचार देखा कि बड़ोदरा में आर्थिक तंगी के अभाव में एक परिवार के छः लोगों ने आत्महत्या कर ली। मष्तिष्क ने काम करना बंद कर दिया, ये कैसे देश का निर्माण कर रहे है हम? ये कैसा विकास है – जहाँ हम सबको रोजगार की, आजीविका चलाने की गारंटी ना दे पायें?

और यह घटनाएं उस देश में हो रही है, जहाँ चींटी कुत्ता पक्षी गाय साधु सन्यासी सभी के भोजन का प्रबंधन समाज करता है बिना प्रतिफल के, फिर भी ऐसी घटनाएं- क्यों?
साथ ही अबोध बच्चियों के साथ बलात्कार की घटनाएं, लड़की के शादी से इनकार पर उसकी हत्यायें बढ़ रही है।

क्या हम अपनी सांस्कृतिक विरासत खो रहे हैं, क्या हम समाज के प्रति असंवेदनशील हो रहे हैं ? क्या समाज में चरित्र नैतिकता के उत्थान पर धन की प्रधानता हो रही है? क्या भौतिकता हमारी सभ्यता का भक्षण कर रही है?
जी हाँ! यही सत्य है ?

बचपन में हम अपने परिवार में आने वाली मेहतरानी, नाईन, बर्तन मांजने वाली, दुकान घर पर काम करने वाले कामगारों को ताई- चाची- अम्मा- ताऊ आदि संबोधन बोला करते थे और उनके पर छूआ करते थे, मौहल्ला पड़ोस में रहने वाले सभी बड़ों को यथोचित सम्मान ही नहीं देते थे अपितु डरते भी थे, किन्तु आज…

ना तो हमें किसी की परवाह है और ना ही किसी को हमसे कोई मतलब है, महानगरों में तो स्थिति इतनी भयावह है कि बहुमंजिला फ्लेटों में रहें वाले लोग अपने पड़ोसी को पहचानते तक नहीं ।

ऐसे तो ना थे हम, किसने हमारे समाज को नीरस और निष्ठुर बना दिया। आज याद आ रहे हैं पंडित दीनदयाल उपाध्याय जिन्होंने #एकात्म_मानववाद का दर्शन हमें दिया

और हम इस #कृण्वन्तो_विश्वर्यम के आधारभूत दर्शन के विपरीत अपने देश और समाज को कहाँ ले जा रहे हैं? कहाँ जा रहे हैं हम – जातियों संप्रदायों में परस्पर विद्धेष, अवसरों की डकैती, धन की सर्वोच्चता, प्रेम रस के अकाल से भरा जीवन, यही ना….

अब भी समय है समाज संस्कृति राष्ट्र के विनाश से बचने को, विकास की थोथी कल्पनाओं से बाहर आकर अपनी सनातन सांस्कृतिक धरोहर की ओर लौटें और यह जब तक सम्भव न होगा….
जब तक बहुमत की राजनीति देश में सामाजिक आर्थिक सांस्कृतिक धर्मिक शैक्षिक नीतियों का निर्धारण करेगी जिसे अल्प- शिक्षित स्वार्थी भ्रष्ट अपराधी माफिया चलते हों ।
स्रोत:व्यक्तिगत विचार अशोक चौधरी
अलीगढ़