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पीड़ा मन की:पोखरों को ढूंढ रहे नदियां विलुप्त है,आग बरस रही है गौरैया लुप्त हैं…

पीड़ा मन की :
बाजार नया है और नयी रवानी है,
गधों के सींग है बूढ़ों को जवानी है;
ये तो काट कर खा गए जंगल सारे,
दावा लिख दी विकास की कहानी हैं।
पोखरों को ढूंढ रहे नदियां विलुप्त है,
आग बरस रही है गौरैया विलुप्त हैं
किस ओर जा रहे हैं ये तो पता नहीं,
खुद को मिटाने की हमने ही ठानी है।
सड़को के पेड़ कट कर फाइलों पर लग गए,
कंक्रीट के जंगल अब खेतों में बन रहे;
नस्ल फना हुई जो पूजती थी पेड़ों को,
दुनियाँ की तबाही का बारूद बना रहे;
पत्थरों के बुत ही आज पैदा हो रहे हैं,
अपने ही आंसुओं से प्यास अपनी बुझा रहे।
अशोक चौधरी
आहुति – अलीगढ़