
भगवद्गीता का निवेश मंत्र
आज के आधुनिक युग में “निवेश” शब्द सुनते ही सामान्य व्यक्ति के मन में सबसे पहले फिक्स्ड डिपॉजिट, म्यूचुअल फंड, शेयर मार्केट या प्रॉपर्टी जैसी भौतिक वस्तुओं का विचार आता है। लोग अपना धन निवेश करके भविष्य में अच्छा लाभ, ब्याज या उन्नति की आशा करते हैं। परंतु श्रीमद्भगवद्गीता इस शब्द को एक गहरे आध्यात्मिक आयाम देती है।
भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि सबसे उत्तम और सर्वोत्तम निवेश वह है, जो हम अपनी बुद्धि का करते हैं।
*मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय।*
*निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः॥*
( भगवद्गीता १२.८ )
अर्थात् अपने मन को मुझमें ही स्थिर करो और अपनी बुद्धि का निवेश मुझमें कर दो। तब तुम निश्चित रूप से मुझमें ही निवास करोगे। इसमें कोई संशय नहीं है।
गीता स्पष्ट कहती है — अत ऊर्ध्वं न संशयः।
अर्थात् इसमें कोई संदेह नहीं। यह नियम उतना ही निश्चित है जितना कि बैंक में FD करने पर ब्याज मिलना। फर्क सिर्फ इतना है कि भौतिक निवेश कभी न कभी खत्म हो सकता है, पर ईश्वर में बुद्धि का निवेश कभी नष्ट नहीं होता। यह जन्म-जन्मांतर तक साथ देता है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम अपनी बुद्धि को नौकरी, पैसे, रिश्तों और सुख-सुविधाओं में लगाए रखते हैं। परिणामस्वरूप मन अस्थिर और दुखी रहता है। गीता हमें सलाह देती है कि बुद्धि का सबसे सुरक्षित और लाभदायक निवेश भगवान के चरणों में करो। जब बुद्धि ईश्वर में लग जाती है, तब सारी क्रियाएँ स्वतः शुद्ध और फलदायी हो जाती हैं।




