चिंतन:आसक्ति से बचाव..

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ऋषि अश्मा ने जनक के साथ संवाद करते हुए मानव मन की सुख दुखानुभूति को स्पर्श किया है।

*मानसानां पुनर्योनिर्दु:खानां चित्तविभ्रम:।*

*अनिष्टोपनिपातो वा तृतीयं नोपापद्यते।।*

( महाभारत, शांतिपर्व 28, 12 )

मानसिक दुःखों का बार- बार जन्म दो ही कारणों से होता है — चित्त का विभ्रम ( भ्रम, मोह, गलत समझ ) अथवा अनिष्ट की प्राप्ति ( जो नहीं चाहते, उसका आना )। तीसरा कोई कारण नहीं है।

ऋषि अश्मा जनक को बता रहे हैं कि अधिकांश मानसिक पीड़ा आसक्ति और अविवेक से ही उत्पन्न होती है।

*चित्तविभ्रम* → जब मन सत्य को नहीं पहचान पाता, मोह, क्रोध, लोभ, भय या अहंकार में फंस जाता है।

 

*अनिष्टोपनिपात* → जब बाहर से कोई अप्रिय घटना घट जाती है।

दोनों ही मूलतः *विषय-आसक्ति* से जुड़े हैं। जब हम किसी व्यक्ति, पद, धन, सम्मान या परिणाम से चिपक जाते हैं, तब इन दोनों में से कोई न कोई दुख अवश्य आता है।

भगवद्गीता इस सत्य को और भी गहराई से विस्तार देती है।

*संगात् संजायते कामः…* (2.62) — आसक्ति से कामना, कामना से क्रोध, क्रोध से मोह…

*रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्* (2.64) — राग-द्वेष से रहित होकर विषयों में विचरण करने वाला ही शांति पाता है।

कहने का तात्पर्य है कि आसक्ति से बचना चाहिए और समय का सदुपयोग यह सोचकर करना चाहिए कि जीवन कमल पत्र पर पड़ी पानी की बूंद से अधिक कुछ नहीं है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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