
कर्म की शुभता
जो मनुष्य प्रत्यक्ष दुष्कृत्यों से स्वयं को विरत रखता है, आवश्यक नहीं कि वह पुण्यात्मा की श्रेणी में प्रतिष्ठित हो जाय। कर्म का शुभत्व केवल निषेधात्मक शुद्धता में नहीं, अपितु कर्तव्यनिष्ठा एवं भाव की निर्मलता में निहित होता है। यदि आप अपने दायित्वों से विमुख हैं, यदि आपकी वाणी मधुर नहीं, आहत करती है, यदि आपका दान परमार्थ नहीं, उपकार की आकांक्षा से प्रेरित है या यदि आपकी विनम्रता आत्मप्रदर्शन की अभिलाषा में रूपांतरित हो चुकी है तो यह सभी कर्म भले ही लौकिक रूप से दोष रहित प्रतीत हों, आध्यात्मिक मर्म में शुभ नहीं हैं। कर्म की शुभता वाह्य आचरण में नहीं, उसके अंतर्निहित संकल्पों में बसती है। एक मुस्कान भी अशुभ हो सकती है, यदि वह व्यंग्य से युक्त हो। धर्म चित्तवृत्तियों की परख है।
अत: जो अपने अहंकार की तुष्टि के लिए पुण्य का व्यापार करता है, वह भी उतना ही अशुभ कर्म करता है, जितना वह व्यक्ति जो क्रोध में अपशब्द उच्चारित करता है।
अतः कर्म की सच्ची शुभता बाहरी आचरण में नहीं, अपितु अंतर्मन की निर्मलता और निष्काम भाव में निहित है।
जो साधक अपने प्रत्येक कर्म को ईश्वरार्पण की भावना से करता है, वही वास्तव में पुण्य का अधिकारी बनता है।
आज का दिन शुभ मंगलमय हो



