
धर्म के सर्वोत्तम लक्षण
(जिसे कोई भी पुरुष धर्म के इन लक्षणों को अपने जीवन में धारण कर ले तो इस दुःखरूप संसार सागर में पुनः लौटकर नहीं आयेगा।
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः |
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणं ||
( मनु० ६ | ९२ )
धर्य, क्षमा, मन का निग्रह, चोरी का न करना, बाहर-भीतर की शुद्धि, इन्द्रियों का संयम, सात्त्विक बुद्धि, अध्यात्मविद्या, यथार्थ भाषण और क्रोध का न करना—धर्म के दस लक्षण हैं |
अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः ||
( योग० २ | ३० )
अहिंसा, सत्यभाषण, चोरी न करना, ब्रह्मचर्य का पालन और भोग-सामग्रियों का संग्रह न करना—ये पांच प्रकार के यम हैं |
शौचसन्तोषतपः स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः |
( योग० २ | ३२ )
बाहर-भीतर की पवित्रता, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और सर्वस्व ईश्वर के अर्पण करना—ये पाँच प्रकार के नियम हैं |
इन सबका निष्कामभाव से पालन करना ही सच्चा धर्माचरण है |
यही धर्म के सर्वोत्तम लक्षण हैं, इन्हीं से परमपद की प्राप्ति होती है | अतएव जो सच्चे हृदय से मनुष्यमात्र की सेवा करना चाहते हैं, उन्हें उचित है कि वे उपर्युक्त लक्षणों से युक्त धर्म को ही उन्नति का परम साधन समझकर स्वयं उसका आचरण करें और अपने दृष्टान्त तथा युक्तियों के द्वारा इस धर्म का महत्त्व बतलाकर मनुष्यमात्र के हृदय में इसके आचरण की तीव्र अभिलाषा उत्पन्न कर दें | वास्तव में यही सच्चा धर्म-प्रचार है और इसी से लौकिक अभ्युदय के साथ-साथ देश-काल की अवधि से अतीत मुक्तिरूप परम कल्याण की प्राप्ति हो सकती है | इस स्थिति को प्राप्त करके पुरुष दुःखरूप संसार सागर में पुनः लौटकर नहीं आता
आपका दिन शुभ एवं मंगलमय हो।



