चिंतन:प्रारब्ध ही तय करता कार्य सिद्धि को.

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किसी भी काम की होने की पूर्ति प्रारब्ध के अनुसार होती है

प्रत्येक मनुष्य एक सीमित अवधि के लिए इस संसार में आता है और परमपिता ने हमारे हिस्से में जितना सुख या दुख लिखा है उसे हमें हर हाल में भोगना ही पड़ता है। इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति की नियति तय है और यही प्रारब्ध यानी भाग्य है।

जैसे धन और भोग का प्रारब्ध अलग-अलग होता है अर्थात् किसी का धन का प्रारब्ध होता है, किसी का भोग का प्रारब्ध होता हैं, किसी का धन और भोग दोनों का प्रारब्ध होता हैं और किसी का न धन का ही और न भोग का ही प्रारब्ध होता हैं।

उदाहरण के तौर पे आप अपने आस – पड़ोस देखते होंगे कि अमुक व्यक्ति के पास बहुत धन हैं लेकिन वो व्यक्ति किसी न किसी प्रकार की रोग से ग्रसित होने के कारण उस धन का भोग अपने शरीर के लिए नहीं कर पाता। अगर वो शुगर से ग्रसित हैं तो रसगुल्ला नहीं खा पाता। अगर वो शरीर से विकलांग है तो धन रहते हुए शरीर उस धन का भोग नही कर पाता इत्यादि यहां पे कहने का तात्पर्य हैं कि अमुक व्यक्ति का धन का प्रारब्ध तो हैं लेकिन भोग का नहीं।

जिसका भोग का प्रारब्ध तो हैं पर धन का नही तो उसे धन न रहते हुए भी किसी की दया से, किसी की करुणा से उसको स्वादिष्ट भोजन खाने को मिल जाता हैं, अच्छे अच्छे कपड़े पहनने को मिल जाता हैं इत्यादि।

जिसका धन और भोग दोनों का प्रारब्ध है तो उसे दोनों मिला हुआ हैं।

जिसका न धन का ही न भोग का ही यानी दोनों में से किसी का भी प्रारब्ध नहीं है तो उसे दोनों में से कोई नहीं मिलता हैं।

ऐसे ही धर्म और मोक्ष का पुरुषार्थ भी अलग-अलग होता है अर्थात् कोई धर्म के लिये पुरुषार्थ करता है और कोई मोक्ष के लिये पुरुषार्थ करता है । धर्म के अनुष्ठान में शरीर, धन आदि वस्तुओं की मुख्यता रहती है और मोक्ष की प्राप्ति में भाव तथा विचार की मुख्यता रहती है ।

एक ‘करना’ होता है और एक ‘होना’ होता है । दोनों विभाग अलग-अलग हैं । करने की चीज है‒कर्तव्य और होने की चीज है‒फल । मनुष्य का कर्म करने में अधिकार है फल में नहीं‒‘ *कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन* ’ (गीता २ । ४७) ।

तात्पर्य यह है कि होने की पूर्ति प्रारब्ध के अनुसार अवश्य होती है, उसके लिये ‘यह होना चाहिये और यह नहीं होना चाहिये’‒ऐसी इच्छा नहीं करनी चाहिये और करने में शास्त्र तथा लोक-मर्यादा के अनुसार कर्तव्य-कर्म करना चाहिये । ‘करना’ पुरुषार्थ के अधीन है और ‘होना’ प्रारब्ध के अधीन है । इसलिये मनुष्य करने में स्वाधीन है और होने में पराधीन है । मनुष्य की उन्नति में खास बात है‒‘करने में सावधान रहे और होने में प्रसन्न रहे ।’

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