
समष्टिहित ही सत्य और धर्म है
व्यष्टिहित और समष्टिहित के संबंध में गीता का वाक्य है
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः।
व्यष्टिहित ( व्यक्ति का कल्याण ) और समष्टिहित ( समष्टि/समाज का कल्याण ) के आदर्श सामंजस्य को स्पष्ट करता है।
जो व्यक्ति न तो दूसरों को कष्ट पहुँचाता है और न ही दूसरों के व्यवहार से स्वयं उद्विग्न होता है, वह वास्तव में समष्टिहित का प्रतीक बन जाता है। समष्टिहित का ही दूसरा नाम सत्य है और उसी को धर्म कहा गया है।अंतिम सार यह है कि सच्चा धर्म न तो केवल व्यक्तिगत सुख की खोज है और न ही सामाजिक दबाव में व्यक्ति का विलय। सच्चा धर्म वह है जिसमें व्यक्ति का विकास समष्टि के साथ सामंजस्यपूर्ण रूप से होता है — न संघर्ष, न द्वेष, न उद्वेग। जब व्यक्ति समष्टि का अंग बनकर सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलता है, तभी लोक और व्यक्ति दोनों में शांति स्थापित होती है।
इस प्रकार, समष्टिहित ही परम धर्म है, और इसी में व्यष्टि का भी वास्तविक हित निहित है।
आज का दिन शुभ मंगलमय हो।


