चिंतन:इस संसार में तीन उपलब्धियाँ अत्यंत दुर्लभ है.

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इस संसार में तीन उपलब्धियाँ अत्यंत दुर्लभ है।

 

*प्रथम तो मनुष्य जन्म मिलना* क्योंकि यह देव-दुर्लभ है। देवयोनि भोग-योनि है जब तक पुण्य-कर्मों का फल शेष है, देवयोनि समाप्त नहीं हो सकती। इधर जब तक पाप कर्मों का फल शेष है, तब तक मनुष्य जन्म नहीं मिल सकता है। यह भगवान की कृपा से ही सुलभ हो पाता है। इसलिए गोस्वामी जी कहते हैं :-

बड़े भाग मानुष तनु पावा।

दूसरे किसी सच्चे संत का सत्संग मिलना कठिन है; क्योंकि यह संसार कर्मक्षेत्र है। इसमें मनुष्य प्रत्यक्ष, किंतु अन्तत: दुःख देने वाले कर्मों में लिप्त मिलता है। प्रथम तो संतो का मिलना ही कठिन है। मिल भी जाय तो उनको पहचानना कठिन है।

तभी गोस्वामी जी ने कहा है :-

बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता॥

तीसरा भगवद्भजन में रूचि होना कठिन है।* संसार के विषयों में आसक्ति जितनी सहज है, भजन में आसक्ति उतनी कठिन है। इसलिए भगवान शंकर माता पार्वती जी से कहते हैं

 

सुनहु उमा ते लोग अभागी।

हरि तजि होहिं विषय अनुरागी॥

 

निश्चित ही वे लोग अभागे हैं जो मनुष्य शरीर प्राप्त कर भगवद्भजन नहीं करते तथा हरि का परित्याग कर विषयों के प्रति अनुरक्त होते हैं।

 

 

 

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