चिंतन:आवत न आदर दिहले,जात न दिहलें हस्त_ एही में दुन्नो गईलें,पाहुन औ गिरहस्थ_

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मेहमान और किसान दोनों को चेतावनी

आवत न आदर दिहले, जात न दिहलें हस्त_
एही में दुन्नो गईलें, पाहुन औ गिरहस्थ

लोककवि घाघ और भड्डरी ने ऐसी अनेक नेक कहावतें कहीं हैं, जिनका जनमानस में अमिट प्रभाव है

उपरोक्त कहावत द्विअर्थी है, दो अर्थ निकलते हैं,

पहला यह कि यदि कोई आगंतुक, मेहमान, अतिथि, सम्बन्धी किसी के यहाँ जाय और जिसके यहाँ गया उसने कोई आदर सत्कार या प्रसन्नता न प्रकट की और वापसी के समय आगंतुक के हाथ में विदाई के नाम पर कुछ न रखा चाहे वह एक इलायची ही क्यों न हो सनातन में अतिथि देवो भव का संस्कार बहुचर्चित है।

ऐसे में वह आगंतुक फिर उस घर कभी न आयेगा और जिसके घर आया उस घरवाले यानी गृहस्थ की कीर्ति, लक्ष्मी, समृद्धि भी डूब जाएगी, चली जायेगी

दूसरा अर्थ है –

आर्द्रा (अदरा) नक्षत्र जब आवे, चढ़े और साथ में तनिक भी वर्षा की बूँदें न लावे और यदि हस्त (हथिया) नक्षत्र जाते-जाते, उतरते-उतरते कुछ वर्षा न कर जाय तो ऐसे में किसानी और किसान उस वर्ष गये, मने उपलब्धि संशय में हो जाती है।

 

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