चिंतन:कर्तव्य-कर्म करने में ही तेरा अधिकार है फल में कभी नहीं..

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धन कमाओ, धन का सदुपयोग करो, कोई विपरीत परिस्थिति न आये‒इसकी सावधानी रखो । परन्तु आप दुःखदायी परिस्थिति को दूर कर दोगे‒यह हाथ की बात नहीं है । उद्योग करने के लिये, कर्तव्य-कर्म का पालन करने के लिये मैं मना करता ही नहीं । परन्तु आप सुखदायी परिस्थिति बना लोगे‒यह आपके हाथ की बात नहीं है ।

भगवान्‌ने कहा है

*कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।*

( गीता २/४७ )

कर्तव्य-कर्म करने में ही तेरा अधिकार है, फल में कभी नहीं’ । अतः फल आपके अधिकार की बात नहीं है, पर कर्तव्य-कर्म खूब डट करके, अच्छी तरह से करना चाहिये । उसमें कभी नहीं चूकना चाहिये । परन्तु किसी को दुःख देना, किसी को नीचा दिखाना‒ऐसी जो धारणा है, यह महान्‌ गलत है । इससे भयंकर दुःख पाना पड़ेगा, बच नहीं सकोग

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