
आज पद्मिनी एकादशी पे विशेष
पद्मिनी एकादशी की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ!
भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की कृपा से आपके जीवन में सुख, समृद्धि, शांति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार हो
सनातन धर्म में एकादशी का व्रत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। प्रत्येक वर्ष चौबीस एकादशियाँ होती हैं। जब अधिकमास या मलमास आता है तब इनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है। मल मास जिसे अधिक मास या पुरूषोत्तम मास कहा गया है। इस मास में दो एकादशी आती हैं जो अत्यंत पुण्य दायिनी हैं। पद्मिनी एकादशी ‘शुक्लपक्ष’ में तथा परमा एकादशी ‘कृष्णपक्ष’ में आती हैं। जानते हैं अत्यंत पुण्य दायिनी पद्मिनी एकादशी का क्या महात्मय एवं व्रत विधान है।
विधि और माहात्म्य
पद्मिनी एकादशी अधिक मास या पुरुषोत्तम मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पद्मिनी एकादशी कहते हैं। इसे कमला एकादशी भी कहा जाता है। इस दिन राधा-कृष्ण और शिव-पार्वती की पूजा की जाती है। अन्य एकादशियों के समान ही इस व्रत के विधि विधान हैं। इस व्रत में दान का विशिष्ट महत्त्व है। इस दिन कांसे के पात्र में भोजन, मसूर की दाल, चना, कांदी, शहद, शाक, पराया अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिए। इस दिन नमक का प्रयोग भी न करें तथा कंदमूल फलादि का भोजन करें। अधिक मास की एकादशी अनेक पुण्यों को देने वाली है। इस एकादशी के व्रत से मनुष्य विष्णुलोक को जाता है। यह अनेक पापों को नष्ट करने वाली तथा मुक्ति और भक्ति प्रदान करने वाली है।
कथा
पद्मिनी एकादशी भगवान को अति प्रिय है। इस व्रत का विधि पूर्वक पालन करने वाला विष्णु लोक को जाता है। इस व्रत के पालन से व्यक्ति सभी प्रकार के यज्ञों, व्रतों एवं तपस्चर्या का फल प्राप्त कर लेता है।
इस व्रत की कथा के अनुसार:
श्रीकृष्ण कहते हैं त्रेता युग में एक परम पराक्रमी राजा कीतृवीर्य था। इस राजा की कई रानियां थी परतु किसी भी रानी से राजा को पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई। संतानहीन होने के कारण राजा और उनकी रानियां तमाम सुख सुविधाओं के बावजूद दु:खी रहते थे।
संतान प्राप्ति की कामना से तब राजा अपनी रानियो के साथ तपस्या करने चल पड़े। हजारों वर्ष तक तपस्या करते हुए राजा की सिर्फ हडि्यां ही शेष रह गयी परंतु उनकी तपस्या सफल न रही। रानी ने तब देवी अनुसूया से उपाय पूछा। देवी ने उन्हें मल मास में शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत करने के लिए कहा।
अनुसूया ने रानी को व्रत का विधान भी बताया। रानी ने तब देवी अनुसूया के बताये विधान के अनुसार पद्मिनी एकादशी का व्रत रखा। व्रत की समाप्ति पर भगवान प्रकट हुए और वरदान मांगने के लिए कहा। रानी ने भगवान से कहा प्रभु आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मेरे बदले मेरे पति को वरदान दीजिए।
भगवान ने तब राजा से वरदान मांगने के लिए कहा। राजा ने भगवान से प्रार्थना की कि आप मुझे ऐसा पुत्र प्रदान करें जो सर्वगुण सम्पन्न हो जो तीनों लोकों में आदरणीय हो और आपके अतिरिक्त किसी से पराजित न हो।
भगवान तथास्तु कह कर विदा हो गये। कुछ समय पश्चात रानी ने एक पुत्र को जन्म दिया जो कार्तवीर्य अर्जुन के नाम से जाना गया। कालान्तर में यह बालक अत्यंत पराक्रमी राजा हुआ जिसने रावण को भी बंदी बना लिया था।
जय जय श्री हरि
एकादशी सेवा
आज पद्मिनी एकादशी के शुभ अवसर पे धर्म कार्य में दान – पुण्य का कार्य अवश्य करें।
मान्यता है कि पद्मिनी एकादशी के शुभ अवसर पे दान-पुण्य का कार्य करने से हर प्रकार का पाप नष्ट हो जाता है और घर -परिवार में खुशहाली आती हैं।
जो दान पुण्य का कार्य करने में सक्षम नही है वो इस भीषण व भयानक गर्मी में पशु – पक्षियों के लिए *जल का दान* करें। गर्मी के मौसम में इस चिलचिलाती धूप और भीषण लू में जो असहाय पशु – पक्षियों के लिए जल का व्यवस्था करता है उसे हजार गौदान के बराबर पुण्य प्राप्त होता है।
यथासंभव अपने घर के छतों पे, किसी पेड़ के नीचे या किसी प्रकार की छाया के आसपास पानी का व्यवस्था जरूर करें।
भगवद्गीता समूह लगातार धर्म, अध्यात्म, जनसेवा, भगवान की महिमा, भक्ति को जन जन तक के यहां पहुँचाने के कार्य में प्रयासरत हैं।* हम आपसे निवेदन करते हैं कि इस मंगलमय दिवस पर हमारे प्रचार-प्रसार प्रयासों में अपनी योग्यता अनुसार दान पुण्य कर भगवद्गीता समूह का सहयोग करें.



