। कर्म की अनिवार्यता ।।
सृष्टि में कोई भी व्यक्ति बिना कर्म किए नहीं रह सकता है। हम सभी या तो विचारों के माध्यम से सक्रिय हैं अथवा क्रियाओं के माध्यम से या फिर कारण बनकर कर्म में योगदान कर रहे हैं। कोई भी प्राणी अकर्मण्य नहीं है।
कर्म की व्याख्या तीन श्रेणियों में है इनमें एक क्रियमाण कर्म ( वर्तमान में किए गए कर्म ), दूसरा संचित कर्म ( पिछले कर्मों का संग्रह ) और तीसरा होता है प्रारब्ध ( भाग्य के रूप में फल देने वाले कर्म )।
सभी प्रकृति से उत्पन्न गुणों ( सत्त्व, रजस्, तमस् ) के वशीभूत होकर अनिच्छा से भी कर्म करने को बाध्य हैं।
कहने का तात्पर्य हैं कि कर्म जीवन का आधार है। कोई भी प्राणी कर्म से मुक्त नहीं हो सकता। प्रारब्ध ( भाग्य ) को भोगते हुए भी, व्यक्ति को निष्काम कर्मयोग द्वारा अपने संचित और क्रियमाण कर्मों को शुद्ध करना चाहिए क्योंकि यह गीता में बताया गया मार्ग है जो आत्म-उन्नति की ओर ले जाता है।
आज का दिन शुभ मंगलमय हो।



