
पते की बात : और अब भारत का वैश्विक महाराक्षस अमेरिका से सामना होगा*l
भले ही हम मानवता सौहार्द सहिष्णुता की कितनी भी बातें कर लें, किंतु विश्व पटल पर सदैव #jungle_law ही लागू होता है। जहां प्रत्येक शक्तिशाली देश कमजोर को अपना शिकार बनाता है। लंबे समय से अमेरिका इस वैश्विक जंगल का शक्तिशाली महाराक्षस है। द्वितीय विषय युद्ध के समय से ही अमेरिका की यह रणनीति रही है कि वह किसी भी राष्ट्र को आर्थिक – सांस्कृतिक और सामरिक दृष्टि से पनपने नहीं देता। ऐसे सभी देश – जिनसे इसको खतरा लगता है, उन्हें वाह्य या आंतरिक चुनौतियों में फंसाना, यह इसकी परंपरागत नीति है।
हमें यह भी समझना होगा कि विश्व में कोई भी ऐसा देश जो आर्थिक रूप से समृद्ध रहा, किंतु यदि उसने अपनी मूल सांस्कृतिक विरासत को नहीं बचाया, वह नष्ट हो गया। आपको पता होना चाहिए मुगल जो तैमूर के वंशज थे, मंगोलियन थे संस्कृति का आज नामोनिशान नहीं है, इसी तरह फारस प्राचीन मेसोपोटामिया रोम मिस्र यूनान आदि देश अपनी सांस्कृतिक विरासत न संभाल पाने के कारण समृद्ध होते हुए भी नष्ट हो गए।
भारत के विरुद्ध यह प्रयास अट्ठारहवीं सदी में ही प्रारंभ हो गए थे। गुरुकुलों की समाप्ति मैकाले की कॉन्वेंट शिक्षा पद्धति, भारतीय आर्म्स एक्ट के माध्यम से हिंदुओं का निशस्त्रीकरण, इस्लामिक जिहाद का पोषण खालिस्तान की मांग भारत में भीषण हिंसक दंगे, भारत विभाजन (जिससे भारत को दोनों ओर स्थाई शत्रु मिल गए) आदि आदि।
अमेरिका ने भारत के विरुद्ध पाकिस्तान को भरपूर सहायता कर लगातार हमें युद्ध में उलझा कर रखा, 1971 के युद्ध में उसने पाकिस्तान हर अभाव मदद की। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने अपनी पुस्तक पॉलिटिकल डायरी ने स्पष्ट लिखा है कि अमेरिका भारत का कभी मित्र नहीं हो सकता है।
अमेरिका ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दर्जनों देशों को बर्बाद किया और अनेक विकासशील देशों के भविष्य को बर्बाद किया।
6 और 9 अगस्त 1945 को जापान के हिरोशिमा और नागासाकी में परमाणु बम गिराया था। द्वितीय विश्व युद्ध में जापान को आत्मसमर्पण, जिससे युद्ध समाप्त हो गया ।
कालांतर में अमेरिका को लगा कि साम्यवाद पूरे एशिया में फैल जाएगा तब उसने वियतनाम पर युद्ध थोप दिया जो 1 नवम्बर 1955 – 30 अप्रैल 1975 तक चला। इस युद्ध में एक तरफ साम्यवादी देशों से समर्थन प्राप्त उत्तरी वियतनाम की सेना थी तो दूसरी तरफ अमेरिका और मित्र देशों की दक्षिणी वियतनाम की सेना थी। अंततः युद्ध के ख़र्च न उठा पाने के कारण अमेरिका को हर स्वीकार करनी पड़ी।
मध्य एशिया में इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन के बढ़ते वर्चस्व और कम करने और तेल के कुएं कब्जाने को अमेरिका ने 2003 में इराक पर हमला कर दिया और बाद में सद्दाम हुसैन को फांसी दे दी गई।
इसी प्रकार नॉर्थ फ्रंट की सेनाओं को रोकने अफगानिस्तान में अमेरिका ने तालिबान को खड़ा किया। इसी प्रकार अमेरिका ने भारत के विकास को प्रभावित करने के लिए पाकिस्तान को पाला आज पाकिस्तान दिवालिया हो गया । पाकिस्तान का दोष केवल इतना है कि उसने औकात से बाहर भारत को बर्बाद करने को अमेरिका की मदद ली।
इसी प्रकार अमेरिका में रूस को बर्बाद करने को यूक्रेन जैसे देश को तबाह कर दिया, हाल ही में भारत को अस्थिर करने को बांग्लादेश का सत्ता परिवर्तन कराया गया और अब ईरान का नंबर लगा हुआ है।
विश्व पटल पर विकासशील देशों ने 1961 में गुटनिरपेक्ष आंदोलन नाम से एक अंतरराष्ट्रीय संस्था बनाई। बेलग्रेड सम्मेलन में हुई थी जिसमें भारत के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू, मिस्र के पूर्व राष्ट्रपति गमाल अब्दुल नासिर, और युगोस्लाविया के राष्ट्रपति टीटो आदि थे। जिसका उद्देश्य विश्व राजनीति में अमेरिका की दादागिरी रोकना था। इसी प्रकार
सितंबर 2006 में, न्यूयॉर्क शहर में संयुक्त राष्ट्र सभा की आम बहस के दौरान आयोजित प्रथम ब्रिक विदेश मंत्रियों की बैठक के दौरान इस समूह को ब्रिक के रूप में औपचारिक रूप दिया गया जनवरी 2025 तक, ब्रिक्स में कुल 10 देश हैं. इनमें ये देश शामिल हैं:
ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ़्रीका, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, इंडोनेशिया।
जिस प्रकार भारत में श्री नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत के सर्वांगीण विकास की ओर प्रेरित किया है और उनके नेतृत्व में ब्रिक्स देशों की नीति एक सशक्त रूप लेने लगी है, ब्रिक्स देशों की अपनी करेंसी निकलने और De Dollarization की चर्चा भी चल पड़ी, इससे अमरीका में भारी हलचल है। जो बाइडन जो वामपंथी और डीप स्टेट के इशारे पर कम कर रहे थे। अब डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिका नीति में कुछ परिवर्तन की आशा थी, किंतु ट्रंप ने जो संकेत दिए हैं, वह स्पष्ट नहीं है। राष्ट्रपति ट्रंप भारत की बढ़ती शक्ति से टकराना तो नहीं चाहेंगे, किंतु अमेरिका को ब्रिक्स देशों का बढ़ता प्रभाव किसी भी कीमत पर बर्दास्त नहीं है ।
भारत के सामने बहुत कड़ी चुनौतियां है, उसे अपना आर्थिक विकास करना है, साथ ही अपनी सनातन सांस्कृतिक विरासत को भी बचाना है।
और भारत की सारी इस्लामिक खलिस्तानी और ईसाई मिशनरी गतिविधियों का संचालन अमेरिका की डीप स्टेट के संरक्षण में चलती है और कांग्रेस आम आदमी पार्टी सहित भाजपा विरोधी अन्य दल भी वहां से संचालित हैं, तो इन चुनौतियों के बीच भारत को आर्थिक कूटनीतिक सामरिक रूप से महाशक्ति के रूप में स्थापित करना लोहे के चने चबाने जैसा ही हैं।
स्रोत एवं विचार
अशोक चौधरी
अध्यक्ष आहुति अलीगढ़




