उत्तम भय
( राम कोश की चोरी और विश्वास का अंत )
जिस भय से देवता भी भयभीत हो जायें उसे उत्तम भय कहते हैं-
*देवा भयमाजग्मुरुत्तमम् l*
यहाँ उत्तम का अर्थ निरतिशय, सर्वाधिक या अत्यधिक है l जिस भय का निराकरण नहीं समझ में आ सके वह दुर्निवार भय होता है l उसके निराकरण तक पहुँच पाना असंभव होता है। उस विनाश से उत्पन्न उत्तम भय से केवल कोई अदृश्य शक्ति ही बचा पाती है l
जब रक्तबीज पर वैष्णवी, ऐंद्री, माहेश्वरी, कौमारी, वाराही ने प्रहार किया तो उसके रक्तबिंदु से सौ, फिर सहस्र, फिर लक्ष,
फिर करोड़ वैसे ही असुर उत्पन्न हो गए l देवों को लगा एक ही रक्तबीज भयंकर है यहाँ तो करोड़ो करोड़ असुर उसी के सदृश उत्पन्न हो गये l अब इस भय का निराकरण कैसे होगा? यह तो
अंत हीन भय है l देवों का अतिशय भय ऐसे ही नहीं है l अब वे कहाँ छुपेंगे ?
उत्तम नैतिक भय
मुझे राष्ट्र मंदिर श्रीराम मंदिर से हुई चोरी के कारण उत्तम भय उत्पन्न हुआ है l अब राष्ट्रधन, देवधन कुछ भी सुरक्षित नहीं है l यह चोरी राम कोश राष्ट्र कोश से हुई है l यह चोरी राम भक्त राष्ट्र भक्त की पवित्र छाया में हुई है l जहाँ जाकर व्यक्ति निर्भ्रान्त ढंग से विश्वास पूर्वक सोता था वहाँ से चोरी हुई है l यह उत्तम भय इसलिय उत्पन्न हुआ है कि लोगों ने राम के साथ छल किया है l अब किस पर विश्वास करने का अभ्यास बनायेंगे? अतः यह उत्तम भय है मेरे लिएl
देश में नैतिक, आध्यात्मिक और वैचारिक अधिष्ठान का थोड़ा अंश अवश्य बचना चाहिए l यदि ऐसा व्यवहारतः नहीं बचा तो केवल छल बचेगा



